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अनिल कुर्मी

परिचय

भोजपुरी भाषा के ईतिहास बहुत पुरान बा । हमनी अभि जे कुछ भी देखऽतानी चाहे सुनऽतानी, भोजपुरी भाषा के एहाँ तक लेके आवे में बहुत लोग द्वारा संघर्ष भइल बा, ए बात से त सब केहु जानकार बा ।

बाकि आज ईतिहास के पन्ना जादे नइखे पल्टावे के । भोजपुरी भाषा के साहित्य आ संस्कृति भी ओतने ही मजबूत बा जेतना सरलता आ मिठास भोजपुरी भाषा में बा । कुछ लोग भोजपुरी साहित्य से एकदम से अन्जान बा, भोजपुरी में लिखल एको गो किताब नइखे पढ़ले । कुछ लोग के त पतो नइखे कि भोजपुरी भाषा में साहित्य के पुरान ईतिहास बा । कुछ लोग त विश्वास भी नइखे कऽ सकत कि भोजपुरी भाषा में एल्बम गाना आ सिनेमा छोड़ि के कुछो अउरो भी बन सकता चाहे लिखा सकता । ओह प्रवृत्ति के लोग भोजपुरी भाषी भी बा, बाकि जादेतर लोग गयर भोजपुरी भाषी बा, जे भोजपुरी भाषा के परिभाषा भोजपुरी गाना (अश्लील) आ सिनेमा से करेला । अब एमन ऊ लोग के गलती भी देखावे के ना मिली । काहें कि भोजपुरी भाषी लोग आपन साहित्य, संस्कृति के ओ लोग तक पहुँचावे में ओतना सक्रिय आ सफल नइखे । बाकी लोग, जे भोजपुरी भाषा के सन्दर्भ में बहुत बड़ा भ्रम में बा, ओह लोग के भी कुछ हद तक गलती ई बा कि भोजपुरी भाषा के ईतिहास खोजे, पढ़े, जाने बिना ही बहुत सारा भ्रम पैदा कइले बा आ फइलौले बा ।

 

सन्दर्भ

कौनो भी भाषा अश्लील ना होला । आ बिना अश्लीलता के कौनो भी भाषा ना होला । अगर कौनो भाषा में अश्लीलता ना रही, त ऊ भाषा पूर्णता प्राप्त ना करी । भाषा आ संस्कृति में प्रत्यक्ष सम्बन्ध होखेला । कौनो भी सभ्यता के पहिचान ईहे भाषा आ संस्कृति से स्थापित होला । अश्लीलता भाषा, संस्कृति, समाज में भी हो सकता, ई सब सभ्यता के उपर भर परेवाला बात बा । कौनो भी भाषा के स्थापित करे के खातिर साहित्य के बहुत बड़ा भूमिका रहेला । आ सहित्य में बहुते सब विधा बा, जे अपना-अपना तरिका से भाषा के विकास आ संरक्षण करेला । ओही से साहित्य रचना करेवाला साहित्यकार सब के, भाषा के सब से बड़का रक्षक मानल जाला । आधुनिक युग में गीत संगित आ सिनेमा भी बहुत ही औवल तरिका से भाषा संरक्षण में भूमिका निभावता । जौना भाषा में गीत संगीत आ सिनेमा कम्जोर बा, ऊ भाषा भी एक तरह से कम्जोर लौकेला ।

 

भोजपुरी भाषा के बात भी इहे बा । गीत संगीत आ सिनेमा से ही अभि के भोजपुरी भाषा के पहिचान बन रहल बा । ई बूरा बात नइखे । भाषा के स्थापित करे में ई मनोरंजन के साधन बहुत बड़ा योगदान दे रहल बा । आ उहो अन्तर्राष्ट्रिय स्तर पर । और ई हमनी के भाषा भोजपुरी के खातिर बहुत बड़ा आशिर्बाद बा । लेकिन एकरे साथ साथ एगो बहुत बड़ा श्राप भी साथ में चलता । और ऊ बा अश्लीलता । सिनेमा से कई गुणा जादे अश्लीलता भोजपुरी गाना सब में सुने के मिलता ।

 

और आज के सवाल भी ईहे बा, अश्लिलता काहें ? सिनेमा में त लोग लगानी लगावता, आ दर्शक भी टिकट खरिद के सिनेमा घर में देखे जाता । ई त खैर दर्शक लोग के आपन स्वतन्त्रता के बात बा, मर्जी के बात बा । लेकिन भोजपुरी कें जौन अश्लील गाना सब गाँव घर, वियाह, भोज, आर्केष्ट्रा, बस, टेम्पो, ठेला दोकान, सहर, बजार में खुलेआम लाउड स्पीकर, चोङा आ डी.जे. लगा के बजता, ओकर का ? जे के सुने के बा ऊ अपने त बेशरमी से सुनते बा, बाकि जे के ना सुने के, ओहु के जबरजस्ती सुनावता, खुलेआम ! सरेआम ! काहें केहु कुछु बोलत नइखे ? सब केहु काहें चापचाप सुनि के पटा जाता ? समाज में केहु नङ्गा नाच देखावता, आ समाज के नङ्गा करता, बाकी लोग काहें अपना-अपना आँख पर पट्टी बाऩि के नजर झुकवले अपना घर के केवाड़ि आ खिड़्की बन्द करता ? आवाज काहें नइखे उठावत, सवाल काहें नइखे उठावत ? ई अश्लील हरकत के परिणाम के बारे में केहु काहें नइखे सोंचत ?

 

चिन्ता

अभि ई भयानक रूप नइखे लेले, माहोल अपना हाथ में बा, बाकि अगर ई सब एहीतरे चलत रही त एक दिन हमनी के भाषा, संस्कृति, सभ्यता के लोग अश्लील नजर से देखे लागि । और ओ समय पर ऊ लोग सही भी रही । और आज भी गयर भाषी लोग से पुछल जा, त जानल बुझल लोग के मुह से भी ‘‘‘भोजपुरी’ के पर्यायवाची शब्द ही ‘अश्लील’ ह ’’ सुने के मिली, ‌और ई हमार अनुमान ना अनुभव ह । मनोजरंजन, चाहे कौनो भी विधा में; भोजपुरी भाषा में या भोजपुरी भाषा के; जब अश्लीलता आ/भा हिनता से जोड़ल जाला, त बहुत सारा भोजपुरी भाषी भी ओकर आनन्द लेला लोग । और एकर सिर्जना करेवाला लोग के भी आपन-आपन अलग-अलग रणनीति बा, और ऊ लोग भी ई सब चीज हर्सो-उल्लास के साथ आम जनता में परोस देला । और ऊ लोग जब ई सब चीज परोसेला त ओकरा सब के लागेला कि भोजपुरी भाषी सब बहुत प्रसन्न बा । लेकिन बात ओइसन नइखे, बहुत लोग भोजपुरी भाषी बा, जेकरा इहे सब बात से अपना आप के भोजपुरी भाषी बतावे में हिचकिचाहट होखेला । बहुत सारा अइसन भोजपुरीया लोग भी बा जे ना भोजपुरी गाना सुनेला नाहीं भोजपुरी सिनेमा देखेला । लेकिन दोष के बराबर हिस्सेदार उहो लोग बा । काहें कि गलत हो रहल बा मालूम भइला के बादो भी, ऊ लोग कहियो ए अश्लीलता के खिलाप आवाज ना उठवले आ नाहीं अभि उठावता । एक दू लोग भाषा प्रेमी होके कभि कबार आवाज उठावे के कोशिस भी कइलस्, बाकी भाषा के रक्षक बनि के बइठल कुछ लोग ओकरा सब के आवाज उठे से पहिलहीं दबा देहलस् । ई कहि के कि भोजपुरी भाषा के उपर अश्लीलता के किचड़ उछाल रहल बा । अइसने लोग के कारण से ही बहुत बेर आवाज उठि के भी आज तक के ईतिहास में कौनो परिवर्तन देखे ना मिलल ।

 

सुरुवात में नाटक नौटंकी में अश्लीलता सिमीत रहे । हमरा अभि भी याद बा, रम्पत हरामी के नौटंकी । लोग ओकर बहुते आनन्द लेहलस् । गाँव घर के नाटक नौटंकी में भी धिरे धिरे ओकर छाप परे लागल । बाकी ऊ सब एक हद तक पचेवाला अश्लीलता रहे, जे गाँव के लइकई से लेके बुढ़ाई तक के दर्शक के सामने प्रस्तुत होखे । बाकी परिवार के भी कुछे लोग बइठि के आनन्द लेत रहे, घर के सारा लोग ना । ई चिज पर कुछ कला के व्यापारी लोग के नजर पड़ि गइल । और ऊ लोग अश्लीलते के आपन व्यापार के मूल आधार बनावे लागल । और कैसेट आ ओकरे बाद सीडी के मार्फत भी गीत, आ नौटंकी आवे लागल । लोग के मनोरंजन के मुख्य आधार उहे सब बने लागल । लोग नाच आ ड्रामा देखल छोडि के बाजा (म्युजिक प्लेयर - कैसेट प्लेयर) आ सीडी प्लेयर (टी.भी.) पर उतर गइल । ओही समय में भोजपुरी में गुड्डु रङ्गीला, राधे श्याम रसिया, आदि जइसन कुछ गायक लोग अश्लील गाना के लहर लेके उभरल । ओ समय पर ई मनोरंजन के साधन में सीडी ही सबकुछ रहे । लोग के लगे दोसर कौनो रास्ता ना रहे । जे आवे उहे देखे लागल । कुछ अच्छा सब चिज भी बनत रहे । लेकिन गलत चिज के प्रचार जल्दी होला, अश्लील गाना सब के प्रचार भी ओइसे कुछ भइल । अगर ओही समय पर अश्लीलता के विरोध कइल गइल रहत त आज ई आर्टिकल लिखे के जरुरत ना परत । बाकि लोकप्रियता पावे के चक्कर में लोग अश्लीलता के हद पार करे लागल । ओ समय पर भी अच्छा गावे वाला लोग रहे, लेकिन बुराई के परछाईं में अच्छाई ओतना साफ ना देखाइल । और ई बात आज भी यथावत बा, अच्छा गाना एल्बम आज भी बनता बाकि दुनियाँ भोजपुरी के पर्यावाची अश्लील ही बतावता । एगो पड़ाव पर जब ऊ अश्लील गाना गाए वाले गायक लोग सेराए लागल । ओही समय पर खेसारी लाल यादव, दिनेश लाल यादव, पवन सिंह लोग उभर के आगे आइल । जब तक ई लोग कलाकार रहे, तब तक गाना एल्बम अच्छा रहे । बाकि जइसे ई लोग स्टार भइल, निर्माता लोग के डिमांड पर काम करे लागल, ए लोग के गाना आ सिनेमा में अश्लीलता झल्के लागल । भोजपुरी भाषा के प्यार के साहारा से लोग के मुकाम मिलल, बाकि उचाई मिलला के बाद उहे लोग भाषा के नङ्गा करे में कभि भी सवाल ना उठवले, ना खुद से नाहीं लेखक, निर्माता आ निर्देशक से । आजकल त कुछ एकदम चवन्नी छाप लोग भी बा, जे अपने आप के गायक कहावेला, बाकि ओ लोग के ना सूर, ताल, लय के ज्ञान बा, नाहीं कला । अटो-ट्युनर भी ए लोग के कारण से बदनाम हो गइल बा । आ ओहु पर ई लोग खाली अश्लील गाना ही गावे के चाहेला । ई सब के सब पुरान अश्लील गायक लोग के देखा सिखी ह । लोग देखा सिखी अच्छा चिज के भी कऽ सकता, बाकी बात उल्टा होता । बात अइसनो नइखे कि सारा के सारा अश्लील ही बनता, अच्छा भी बहुते बनता बाकि जे में अश्लीलता नइखे ओकर प्रोत्साहन, प्रचार ना होखेला; निर्माता आ दर्शक दूनो पक्ष के ओर से । गयर भोजपुरी भाषी भी ई सब बात देखता, बुझता । बाकी जब बाहर के लोग (गयर-भाषी) इहे बात कहेला, बोलेला, बतावेला, जतावेला, देखावेला त हमनी के बर्दास ना होखेला ।

 

विजोग

हालही में एगो घटना घटल । हम ऊ घटना याद दिलावे के चाहतानी । बलिउड के एगो जानल-मानल अभिनेता सिद्धार्थ मल्होत्रा, एगो चर्चित शो में भोजपुरी के डायग बोले में शौचालय के अनुभूति भइल कहलस् (मुझे ट्वाइले वाली फिलिङ्स् आ रही थी) । ओकर बाद भारत के भोजपुरी सिनेमा के जानल-मानल अभिनेता, गायक, कलाकार सब मल्होत्रा के बिरोध में, गाली देवे पर टुट परल । सिद्धार्थ मल्होत्रा के ई बहुत बड़ा गलती रहे । ओकरा के कौनो भी भाषा के बारे में अइसन गंदा टिप्पणी नाईं करे के चाहीं, नाहीं करे के अधिकार बा । हल्ला कुछिए दिन में शान्त हो गइल । और ओकरे बाद उहे अभिनेता, गायक, कलाकार लोग भोजपुरी में अश्लीलता परोसे में व्यस्त हो गइल । बाकि ए घटना के जिम्मेवार कहीं न कहीं हमनीयो बानी जा । मल्होत्रा के दिमाक मे भोजपुरी के लेके आखिर गन्दा खयाल आइल काहें ? विचार करेवाला बात ह ! मल्होत्रा बलिउड के एगो जानल पहचानल चहरा भइला के कारण से ओकर आवाज दूर तक सुनाई देहलस् । बाकी आम जनमानस (गयर भोजपूरी भाषी) में भी कुछ अइसने भ्रम बा । बाकी हमरा पूरा विश्वास बा, भोजपुरी के कुछ धरोहर लोग जब हमार ई लेख (आर्टिकल) पढ़ि त हमरे तरफ के धारण नकरात्मक भी हो सकता । काहें कि ऊ लोग आपन-आपन धारणा लेके बइठल बा, और ओही धारण के नीचे खुदे दबाइल बा । यथार्थ बात ना ओ लोग के लौकता, नाहीं ऊ लोग देखे के चाहता; समाज के रोदन आ चिल्लाहट ना ओ लोग के सुनता, नाहीं ऊ लोग सुने के चाहता । सायद ओ लोग के डर बा । अपनहीं मुह से भोजपुरी भाषा में अश्लीलता के उच्चारण कइला से कहीं भोजपुरी गंदा ना होजा । लेकिन भितरे भितर अश्लीलता के किड़ा समाज के सड़ा रहल बा, ई बात जनला बुझला के बाद भी ओ लोग के कौनो फिकर नइखे । और ऊ लोग के लागता कि ऊ लोग एहीतरे अश्लीलता के खतम करी । और ओ लोग इहे सब से बड़का भ्रम बा ।

 

‘‘अच्छा कइला से बुरा अपने आप समाप्त होजाई’’, इहो धारणा भी कुछ लोग के बा । बुरा नइखे, बाकी पूरा भी नइखे । और ई भी अश्लीलता के उपर आवाज उठावे ना देवे के एगो बौद्धिक साजिस ह । भोजपुरी में श्लीलता आ अश्लीलता १:४ के अनुपात से बढ़ता । अगर खालि अच्छा के बढ़ावे पे काम होई त बूराई अपने आप कबो ना खतम होई । एगो बात अउरी, जे भी भोजपुरी भाषा के बारे में सोंचता आ लिखता, ऊ लोग खालि सोंचता आ लिखता, सिनेमा क्षेत्र में काम नइखे करत । लिखल बात भी आम लोग तक नइखे पहुँचत, पहुँतो बा त सब लोग पढ़ेवाला नइखे । ओही से सफर बहुत लम्बा होजाई, कइयो पुस्ता के संघर्ष करे के पड़ सकता । जरुरी बा कि सिनेमा आ गाना एल्बम में काम करेवाला लोग भी भोजपुरी भाषा के बारे में सोंचे । अफ्सोस के बात बा कि ऊ लोग के ब्यापार आ लोकप्रियता बाहेक कुछु से मतलब नइखे । जब की हर ईन्टरभ्यू में अपने आप के भोजपुरी से लगाव राखेवाला आ प्यार करेवाला सब से बड़का बतावत रहेला ।

 

सम्भावना

बाकी खालि बुराईए भर नइखे भइल । भोजपुरी में ओह समय पर भी सारदा सेन्हा के जइसन अउरी भी लोग रहे, मनोज तिवारी भी अश्लीलता से दूरे रहि के गाना गवले । अच्छा से अच्छा निर्गुन, बिरहा, चइती, भजन आदी बहुत सारा गाना गावल जात रहे, जौन आज भी ओही खुबसुरती आ सुन्दरता से गावल जा सकेला, उठावल जा सकेला । भोजपुरी आधुनिक फिल्म के लगभग सुरुवात ‘तोहार ससुरा बड़ा पईसावाला’ जइसन सिनेमा से भइल बा । भोजपुरी में आठो पहर, बारहो महिना, हर तिउहार पर गीत संगित के संस्कृति बा, एक से एक पौराणिक धुन बा, जन्म से लेके शादी, मृत्यु तक के गीत संगित के संस्कार बा । बाकि आधुनिकता ई सब पर भारी पड़ रहल बा, चिन्ता के बात बा । और आधुनिकता से बेसी एमन रहल अश्लीलता भारी पड़ रहल बा । देश विदेश में भोजपुरी पहुँच रहल बा, ई बहुत खुसी के बात बा । बाकी खाली गाना आ सिनेमा से पहुँच रहल बा, जौना में अश्लीलता झलकता । ओही गाना आ सिनेमा के मार्फत भोजपुरी के संस्कार, संस्कृति काहें नइखे ओहाँ तक पहुँचत ? जौन सम्भव आ सहज दूनो बा । भोजपुरी के साहित्य काहें नइखे उभरत ? ‘धिरे धिरे होई’ कहला से ना होई, दुनियाँ तेजी से आगे बढ़ रहल बा, नेपाल देश के विकास के गति के हिसाब से चलल जाई त नतिजा आप के सामने बा ।

 

कुल मिलाके बात ई बा कि भोजपुरी खालि एगो भाषा नइखे, ई भोजपुरी भाषी लोग के पहिचान ह । और भोजपुरी में जे भी अश्लीलता बा ऊ हमनी के पहिचान बिगाड़ रहल बा, हमनी के बदनाम कर रहल बा । ई बात के महसुस भइला के बाद, कुछ लोग एकर घोर विरोध भी कइले बा आ करता । भोजपुरी में अश्लील गाना गावे वाले कई लोग के सार्वजनिक रूप से ईटा पाथर भी भइल बा, ई भोजपुरी लोग में सकारात्मक परिवर्तन के ही संकेत ह । भोजपुरी में बहुत सारा साहित्य भी लिखात बा आ साहित्यिक कार्यक्रम भी होता । भोजपुरी भाषा के व्याकरण आ शब्दकोश भी लिखाइल बा । बाकि एतना भइला के बाद भी अश्लीलता के खिलाप काम कइल आ आवाज उठावल दूनो जरुरी बा । निर्माता, लेखक, गायक, कलाकार, स्टुडियो आ सब से महत्वपूर्ण आम जनता; श्रोता आ दर्शक, सभे केहु के अश्लीलता के खिलाप आपन आपन भूमिका निभावल बराबर जरुरी बा । जे केहु भी अश्लील गाना बना रहल बा, जादेतर लोग अपना घर में ना सुनेला, नहीं अपने घर परिवार के सुनावेला । बाकी दुनियाँ के उहे गाना सुना रहल बा । और लोग लाज पचा के सुनतो बा । केतना लोग के त मलतब भी नइखे कि गाना का कहता, बस् सुनते जाता । बाकि बहुत लोग के खातिर ई सारा गाना अपच बा । लोग बिना कुछु बोले चपचाप सुनता, एकर मतलब ई त ना भइल कि कुछ भी सुना दिहल जा । लिखे, गावे, बनावे वाले लोग पहिले अपना घर में सुनावे के हिसाब से बनावले रहत, जौन दस लोग एक साथ बइठ के सुनि सके लायक रहत, त आज भोजपुरी के परिभाषा कुछ और रहत ।

 

बहुत अइसन लोग हमरा से सवाल भी कइलस् कि अश्लीलता का ह ? हम ओ लोग के जवाफ भी देहनीं, जे कुछ भी हमनी के समाज में, संस्कृति में, ब्यवहार में छुपा के राखल जाला, उहे अश्लीलता ह । समाज, सभ्यता के हिसाब से एकर ब्याख्या फरक हो सकता । कौनो भी गाना अगर हमनी के अपना घर के सारा परिवार के साथ में नइखीं सुन सकत आ देख सकत। उहे अश्लीलता ह । अश्लीलता अडियो, भिडियो, पोस्टर कुछो में भी हो सकता । हमनी के समाज में जे कुछ भी पचेवाला नइखे, जे कुछ छुपावे वाला चिज बा, ओके गलत ढङ्ग बाहर ना निकाले के चाहीं । हो सकता कि कौनो चिज परिवर्तन के खातिर बाहर निकालल जरुरी होखे, बाकी कुछो के भी तौर तरिका होला, आ ई गाना में फुहरई आ अश्लीलता लावल त बिल्कुले तरिका ना ह । समाज में बहुत कुछ गलत बा, खराब बा, जौना के बदलल बहुत जरूरी बा, गाना में ऊ सब बात उठा के भी परिवर्तन लावल जा सकता । लोग के ओ सब बात के पर चिन्तन करे के मजबूर कइल जा सकता । समाज में बहुत अच्छा अच्छा चिज भी बा जौना के श्रींगारिक भाव में वर्णन कइल जा सकता, या चाहे कौनो भी प्रकार से उठा के गाना के मार्फत ओपर प्रकाश डाल सकल जाता । बाकी अश्लीलता कदापी पचेवाला बात नइखे ।

 

बहुत लोग अइसन बा जे के केहु कुछु कहत नइखे, गलती महसुस नइखे करावत । ओही से ऊ लोग जान अन्जान में अश्लील गाना गावता आ अश्लीलता फैलावता । बात अइसनो नइखे कि ऊ लोग खालि अश्लीले गाना गावता, अच्छा गाना सब के प्रोत्साहन कइल भी ओतने जरुरी बा, जेतना कि अश्लीलता के हटावल । अगर अश्लीलता के विरोध में बहस होखे, त बात बहुत लोग के समझ में आसानी से चल आई । भ्रम में रहल लोग अश्लील गाना गावल आ बनावल छोड़ि दी । खालि अश्लीलता के खिलाप ना, पहिचान के खातिर भी लड़ाई लड़ल जरुरी बा, और अभिए से जरुरी बा ।

‘‘अबो ना, त कबो ना’’

 

अनिल कुर्मी (भोजपुरी भाषी)

रङ्गकर्मी (कलाकार)

रामग्राम - १७, नवलपरासी (पश्चिम)

प्रदेश नं. ५, नेपाल

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